जहाँ खड़े हो तुम आज,
वहाँ दिल का कोई साज़ नहीं बजता,
लगता है हर कदम पर यूँ,
जैसे कोई सपना अधूरा सा सजता।
नज़रें तकती हैं उस पार का मंज़र,
जहाँ सोच का एक नया शहर बसाया है,
"मुझे तो होना चाहिए था कहीं और"
बस इसी एक ख़्याल ने मन भरमाया है।
सोचो, अगर जादू की कोई राह निकल आए,
एक चुटकी बजते ही तुम वहाँ पहुँच जाओ,
जहाँ पहुँचने के सपने तुम हर रात बुनते हो,
जहाँ की धुन तुम हर पल सुनते हो।
पर ठहरकर ज़रा सोचो उस पल में,
क्या पहुँचते ही तुम्हें सब मिल जाएगा?
या फिर वहाँ भी पहुँचकर यह चंचल मन,
किसी और ही अनजानी राह पर भटक जाएगा?
क्योंकि तलाश जगह की नहीं,
ठहराव की उस प्यास की है,
जो यहाँ रहकर भी दूर है,
और दूर जाकर भी पास की है।
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X