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भार्गव राम खण्डकाव्य - 59

AL Mishra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            देवव्रत थे बचन बद्ध,
        
                                                    
                            
खुशी पितु शांतनु हित।
न करूंगा कभी विवाह,
अरु न धरूंगा सिर छत्र।।

मिला गुरु परशुराम सन्देश,
हो गये थे बेचैन अब देवव्रत।
थे भार्गव राम भी पहुंचे गये,
वायु मार्ग से पावन कुरुक्षेत्र।।

बचन बद्धता के कारण,
असंभव अंबा अपनाना।
जग कलंक के भय से ही,
गुरु युद्ध ही उचित माना।।

अब रथ बैठ गये थे देवव्रत,
चल पड़ी साथ उनकी सेना।
पहुँचे पावन भूमि कुरुक्षेत्र,
सम्मुख देखा गुरु परशु हाथ।।

रथ से उतर गये गंगा पुत्र,
चरण रज धरि गुरुवर की।
लीन्ह आशीष युद्ध भूमि में,
मन मुदित राम युद्ध भूमि में।।
-अशर्फी लाल मिश्र,
4 दिन पहले
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