वो तिरे नसीब की बारिशें किसी और छत पे बरस गईं
दिल-ए-बे-ख़बर मिरी बात सुन उसे भूल जा उसे भूल जा
~ अमजद इस्लाम अमजद
मैं चुप कराता हूँ हर शब उमडती बारिश को
मगर ये रोज़ गई बात छेड़ देती है
~ गुलज़ार
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बरसात का बादल तो दीवाना है क्या जाने
किस राह से बचना है किस छत को भिगोना है
~ निदा फ़ाज़ली
अब के सावन में शरारत ये मिरे साथ हुई
मेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसात हुई
~ गोपालदास नीरज
सावन एक महीने 'क़ैसर' आँसू जीवन भर
इन आँखों के आगे बादल बे-औक़ात लगे
~ क़ैसर-उल जाफ़री
रहती है शब-ओ-रोज़ में बारिश सी तिरी याद
ख़्वाबों में उतर जाती हैं घनघोर सी आँखें
~ अफ़ज़ाल नवेद
ये हुस्न-ए-नौ-बहार ये सावन की बदलियाँ
पीना है फ़र्ज़ और न पीना हराम आज
~ अज्ञात
रुकी रुकी सी है बरसात ख़ुश्क है सावन
ये और बात कि मौसम यही नुमू का है
~ जुनैद हज़ीं लारी
पड़े हैं नफ़रत के बीच दिल में बरस रहा है लहू का सावन
हरी-भरी हैं सरों की फ़सलें बदन पे ज़ख़्मों के गुल खिले हैं
~ हारून फ़राज़
सावन की इस रिम-झिम में
भीग रहा है तन्हा चाँद
~ इंद्र सराज़ी
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