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डाॅ दिनेश त्रिपाठी: दरपन को झुठलाने बैठे हैं

काव्य डेस्क

Urdu Adab
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                            दरपन को झुठलाने बैठे हैं,
        
                                                    
                            
कितने लोग सयाने बैठे हैं।

नये समय की ठोकर से मत डर ,
अभी तो लोग पुराने बैठे हैं। 

उधर जल रही है सारी बस्ती,
इधर आप यूं गाने बैठे हैं। 

फूलों के साहस को करो नमन ,
पत्थर को पिघलाने बैठे हैं। 

खुद से तो अनजान रहे लेकिन ,
औरों को पहचाने बैठे हैं। 

सब डूबे हैं अपनी मस्ती में ,
सबके सब दीवाने बैठे हैं। 

‘शम्स’नज़र का धोखा भर है या ,
वो ही कुछ बेगाने बैठे हैं। 

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