दरपन को झुठलाने बैठे हैं,
कितने लोग सयाने बैठे हैं।
नये समय की ठोकर से मत डर ,
अभी तो लोग पुराने बैठे हैं।
उधर जल रही है सारी बस्ती,
इधर आप यूं गाने बैठे हैं।
फूलों के साहस को करो नमन ,
पत्थर को पिघलाने बैठे हैं।
खुद से तो अनजान रहे लेकिन ,
औरों को पहचाने बैठे हैं।
सब डूबे हैं अपनी मस्ती में ,
सबके सब दीवाने बैठे हैं।
‘शम्स’नज़र का धोखा भर है या ,
वो ही कुछ बेगाने बैठे हैं।
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