आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

डाॅ दिनेश त्रिपाठी: दरपन को झुठलाने बैठे हैं

उर्दू अदब
                
                                                         
                            दरपन को झुठलाने बैठे हैं,
                                                                 
                            
कितने लोग सयाने बैठे हैं।

नये समय की ठोकर से मत डर ,
अभी तो लोग पुराने बैठे हैं। 

उधर जल रही है सारी बस्ती,
इधर आप यूं गाने बैठे हैं। 

फूलों के साहस को करो नमन ,
पत्थर को पिघलाने बैठे हैं। 

खुद से तो अनजान रहे लेकिन ,
औरों को पहचाने बैठे हैं। 

सब डूबे हैं अपनी मस्ती में ,
सबके सब दीवाने बैठे हैं। 

‘शम्स’नज़र का धोखा भर है या ,
वो ही कुछ बेगाने बैठे हैं। 

हमारे यूट्यूब चैनल को Subscribe करें।

3 महीने पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर