"कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबीअ'त से उछालो यारो"
दुष्यंत कुमार का कहा ये शेर काफ़ी है किसी भी हतोत्साहित व्यक्ति में फिर से प्राण फूंक देने के लिए। उनके ऐसे कितने ही कलाम हैं जो सिर्फ़ व्यक्ति नहीं बल्कि पूरे समाज में क्रान्ति पैदा कर सकते हैं, उन्होंने तत्कालीन सरकार के ख़िलाफ़ मुखर होकर बोला। वे अपने कृतित्व और सामाजिक दायित्वों के प्रति इस कदर निष्ठावान थे कि वे सरकारी नौकरी में रहकर भी सरकार के ख़िलाफ़ लिखते रहे। वे आंदोलनों की आवाज़ बने, विरोधी पक्षों द्वारा दमनपूर्ण सरकार पर किए तंज़ की वाणी बने, उनके शेर फ़िल्मों में भी मजलूमों के शोषण का प्रतिनिधित्व करते नज़र आए। उनके लिखे कलाम सिनेमा और संसद के साथ-साथ सड़क तक भी गूंजे।
दुष्यंत कुमार का जन्म 1 सितंबर 1931 को उत्तर-प्रदेश के बिजनौर शहर में हुआ था। बीसवीं सदी के मशहूर कवि और शायरों में से एक दुष्यंत कुमार ने ग़ज़लों को हिंदी भाषा में कह कर उन्हें एक नया सोपान दिया। जितनी बार ग़ज़ल के लिए हिंदी भाषा का चयन किया जाता है, दुष्यंत कुमार अवचेतन में याद आते हैं। उन्होंने कहा कि "मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही/हो कहीं भी आग लेकिन आग जलनी चाहिए" और कितने ही आंदोलनों के नेताओं ने इसे क्रान्ति की ज्वाला के संदर्भ में प्रयोग किया। जब उन्होंने लिखा कि "कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिए/ कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिए" तो इससे सरकार की उन नीतियों पर निशाना साधा गया जिसके वादे तो बड़े-बड़े थे लेकिन वो कभी आम जनता तक नहीं पहुंचीं।
आपातकाल के दौरान उन्होंने आवाम के डर को देखते हुए तत्कालीन सरकार के लिए लिखा था कि "तू किसी रेल सी गुज़रती है/ मैं किसी पुल सा थरथराता हूँ" हालांकि वक़्त के साथ इस शेर के मायने बदले और इसे किसी प्रेम की भावना के तौर पर इस्तेमाल किया गया, फ़िल्म मसान में लोगों ने इसे सुना होगा।
जो महसूस करें उसे लिखें, यह एक बड़ी आसान बात है लेकिन हम जो महसूस करके लिख रहे हैं उसे जीएं भी यह एक बड़ी बात है। सरकार की चापलूसी के इतर नौकरी के भय के बिना दुष्यंत कुमार ने वो सब कुछ लिखा जो एक ईमानदार कलम को लिखना चाहिए। यही एक शायर या कवि को प्रासंगिक बना देती है कि आज भी उसे जगह-जगह कोट् किया जाता है। आख़िर में दुष्यंत कुमार की ग़ज़ल
मत कहो आकाश में कोहरा घना है
ये किसी की व्यक्तिगत आलोचना है
सूर्य हम ने भी नहीं देखा सुबह से
क्या करोगे सूर्य का क्या देखना है
इस सड़क पर इस क़दर कीचड़ बिछी है
हर किसी का पाँव घुटनों तक सना है
पक्ष-ओ-प्रतिपक्ष संसद में मुखर हैं
बात इतनी है कि कोई पुल बना है
रक्त वर्षों से नसों में खौलता है
आप कहते हैं क्षणिक उत्तेजना है
हो गई हर घाट पर पूरी व्यवस्था
शौक़ से डूबे जिसे भी डूबना है
दोस्तो अब मंच पर सुविधा नहीं है
आज-कल नेपथ्य में सम्भावना है