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अली सरदार जाफ़री: उन दोनों को फ़ारसी नहीं आती थी लेकिन हाफ़िज का शेर याद था

काव्य डेस्क

Sahitya
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मेरे सोवियत यूनियन के सफ़र की ख़ुशगवार यादों के निगारख़ाने में दो नौजवान आर्मेनी इंजीनियर भी हैं। उनके नाम मैंने पूछे थे लेकिन फिर याद नहीं रह गए। लेकिन वो दिल पर जो नक़्श छोड़ गए वो अब भी ताज़ा हैं। मेरे और उनके दरमियां हाफ़िज़ शिराज़ी का एक शेर है जिसने हमारी बाहमी मुहब्बत के रिश्ते को मज़बूत कर दिया है। अक्सर ऐसा होता है कि अच्छी शायरी टूटे हुए दिलों को जोड़ देती हैं, बिछड़े हुए को मिला देती है और अजनबियों को दोस्त बना देती है।

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एक दिलचस्प वाक़िया मास्को के बाकू रेस्टोराँ में पेश आया। जब हम (नेरुदा और जैक) बाकू रेस्टोराँ में दाख़िल हुए तो कोई अज़रबैजानी का नग़्मा बज रहा था, लेकिन हमारी सूरत देखते ही साज़ पर "आवरा का गीत" बजने लगा। ये मुहब्बत और दोस्ती का एक ख़ूबसूरत इशारा था। रेस्टोराँ भरा हुआ था लेकिन सोवियतवालों ने अपने मेहमानों के लिए जगह ख़ाली कर दी और हम लोग एक मेज़ के गिर्द बैठ गए। गोर्की इंस्टिट्यूट के दो अदीब तालिब-इल्मों ने हमें देखा। एक नौउम्र लड़की थी और एक लड़का। दोनों ने आपस में कुछ सरगोशी की। लड़की का चेहरा तमतमा उठा और गालों में हँसी के भँवर गहरे हो गए। फिर दोनों हमारी मेज़ पर चले आए। आहिस्ता-आहिस्ता मुहब्बत का ये हलक़ा वसी होता गया। नान, कबाब, शोरबे में से एशिया की ख़ुशबू आ रही थी और चारों तरफ़ चेहरों पर सोवियत की मुहब्बत के फूल खिल रहे थे ।

यकायक बराबर की मेज़ पर शैंपेन का काग उड़ा। हमने मुड़कर देखा, दो लंबे क़द और छ रहरे बदन के आर्मेनी वहाँ से उठकर हमारे पास आए और बग़ैर कुछ कहे हुए मेरा और अहमद अब्बास का हाथ पकड़कर हमें अपनी मेज़ पर ले गए। दोनों ने इशारों से नेरुदा और जैक लंज़े से माफ़ी माँगी और फिर हमारी तरफ़ मुखातिब हुए। उन्होंने पहले रूसी ज़ुबान में कुछ कहने की कोशिश की लेकिन जब मैंने और अब्बास ने कहा, "यानिये गवारो पारोस्की" (मैं रूसी नहीं बोलता), तो वो शायद आर्मेनी ज़ुबान बोलने लगे। हमने तफ़रीहन उन्हें उर्दू में जवाब दिया और हम चारों हँसने लगे।

फिर उनमें से एक ने गिलासों में शैंपेन उड़ेली और तराशे हुए नफ़ीस बिल्लौर के जामों में पिघला हुआ सोना मुस्कुराने लगा। गिलासों को हाथ में लेकर और हमारी तरफ़ इशारा करके कहा,”इंदस्की”(हिंदुस्तानी) और अपनी तरफ़ इशारा करके कहा, "आर्मेनिया"। इंजीनियर ।" मैंने और अहमद अब्बास ने अपने नाम बताए। उन दोनों में से एक ने कहा, "मीर" (अमन) और दूसरे ने कहा, "नेहरू" । फिर दोनों ने अपने-अपने जाम हवा में बुलंद करके एक साथ हाफ़िज का शेर पढ़ा...

अगर आँ तुर्क-ए-शीराज़ी ब-दस्त आरद दिल-ए-मा रा
ब-ख़ाल-ए-हिंदुवश बख़्शम समरक़ंद-ओ-बुख़ारा 

इसके साथ उन्होंने हिंदुस्तान, नेहरू और अमन का जाम पी लिया। मैं आज भी सोचता हूँ और महसूस करता हूँ कि ये जाम कितना हसीन था। उन दोनों को फ़ारसी नहीं आती थी, लेकिन हाफ़िज का शेर याद था।
हाफ़िज ने समरक़ंद और बुख़ारा को महबूब के रूख़सार के एक छोटे से तिल पर निछावर कर दिया, और आज के दौर में आर्मेनी इंजीनियरों ने अमने-आलम के लिए ये शहर हिंन्दुस्तान और नेहरू के हवाले कर दिए।

साभार- किताब लखनऊ की पाँच रातें
अनुवाद- कामना प्रसाद
प्रकाशन- राजकमल पेपरबैक्स

 
4 वर्ष पहले
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