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सन्नाटे भरी रिहाई से तो कैद अच्छी थी।

Yunush khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बता, गुलों का एतबार करके क्या मिला।
        
                                                    
                            
बागबां को, दरकिनार करके क्या मिला।।

हस्ब-ए-हालात , ख़ामोश हो गये थे हम।
मुद्दतों बाद,यूं इज़हार करके क्या मिला।।

यहां, हर सिम्त वीरानों के सिवा क्या है।
सोचता हूं,दरिया पार करके क्या मिला।।

ख्वाहिशों के बिन जीने से क्या फायदा।
ये हसरतें , ख़ाकसार करके क्या मिला।।

सन्नाटे भरी रिहाई से तो कैद अच्छी थी।
हमे ये दामन दाग़दार करके क्या मिला।।
-यूनुस खान
1 सप्ताह पहले
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