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रस्म-ओ-रिवाज, आड़े आती हैं वस्ल में।

Yunush khan

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अपनी इन आंखों को, जाम कीजिए ना।
        
                                                    
                            
यूं मेरी मयकशी को सलाम कीजिए ना।।

सुना है, फिज़ाओं पर हुकूमत है तुम्हारी।
आज जुल्फ लहराकर,शाम कीजिए ना।।

उदासियों में, रहने की आदत है मुझको।
मेरी उदासियों का,एहतराम कीजिए ना।।

एक मुद्दत से, सन्नाटा बरपा है मेरे घर में।
खुदारा , अब हमसे कलाम कीजिए ना।।

रस्म-ओ-रिवाज, आड़े आती हैं वस्ल में।
अब तो इनका,काम तमाम कीजिए ना।।

गर मुझे,अपना गमख्वार कहते हो तुम।
फिर अपने ये ग़म,मेरे नाम कीजिए ना।।

हद-दर्जे मुख्तसर है , मुलाकात अपनी।
कभी तो, रुक कर कयाम कीजिए ना।।

ये फांसले, कुरबतों में बदल जायें सारे।
अब तो,कुछ ऐसे इंतजाम कीजिए ना।।
-यूनुस खान
1 सप्ताह पहले
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