अगरचे,अपने ही ग़म समझे,ग़म दोस्तों के।
मगर अयादत को ना उठे,क़दम दोस्तों के।।
साफ़गोई को, पसंद करते ही नहीं हैं लोग।
समझा रहे हैं हमें, पेंच-ओ-ख़म दोस्तों के।।
कितनी ही गर्दिशों में , घिरा हो वजूद मेरा।
होते नहीं फिर भी, चश्म-ए-नम दोस्तों के।।
ज़माने की नज़र से,छुपाये रखा अब तक।
हुए जो हमपे, ज़ुल्म-ओ-सितम दोस्तों के।।
फहरिस्त बनकर , आ गये अब बाज़ार में।
थे जो सारे, अहसान-ओ-करम दोस्तों के।।
-यूनुस खान