मैंने प्रेम पर लिखना चाहा,
चाहकर भी कुछ लिख न सका।
अब मुझको किसी से मोह नहीं,
न किसी को मुझसे प्रेम रहा।
सब चलते अपनी-अपनी राहों पर,
कोई ठहरा न एक पल के लिए।
इस खामोशी के आलम में,
मिल लेता हूँ खुद से कुछ पल के लिए।
अब कोई आए या कोई जाए,
मुझको उसका अफ़सोस नहीं।
कलम और काग़ज़ अपने हैं,
बाक़ी दुनिया का होश नहीं।
— यश कुमार कुशवाहा