विज्ञापन

रिंद है मय-कदे के साक़ी की पहचान तो है

vinayak anand

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रिंद है मय-कदे के साक़ी की पहचान तो है
        
                                                    
                            
जिसने मय पी नहीं वो दुनिया से अनजान तो है

महफिल-ए-मय-कदे में और भले कुछ न मिले
महफ़िल-ए-ज़ाम में हर बंदे में ईमान तो है

अपनी ही मौत मरेगे हो कहीं के भी वो शाह
ताज़ कितनी भी बुलंदी पे हो इंसान तो है

पेश-मंज़र में बदल तो रहा कुछ भी नहीं पर
वक्त के सिलसिले में इक नया इमकान तो है
5 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all