रिंद है मय-कदे के साक़ी की पहचान तो है
जिसने मय पी नहीं वो दुनिया से अनजान तो है
महफिल-ए-मय-कदे में और भले कुछ न मिले
महफ़िल-ए-ज़ाम में हर बंदे में ईमान तो है
अपनी ही मौत मरेगे हो कहीं के भी वो शाह
ताज़ कितनी भी बुलंदी पे हो इंसान तो है
पेश-मंज़र में बदल तो रहा कुछ भी नहीं पर
वक्त के सिलसिले में इक नया इमकान तो है