विज्ञापन

पर मंज़िलों तक पहुँचने का ज़ज़्बा सबमें नहीं होता।

Vikash Tripathi

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मंज़िलों तक पहुँचने की चाहत तो सभी रखते हैं,
        
                                                    
                            
पर मंज़िलों तक पहुँचने का ज़ज़्बा सबमें नहीं होता।

सच को ज़ुबाँ तक ले आते हैं बहुत से लोग,
पर सच कहने का हौसला सबमें नहीं होता।

ख़्वाब देखना तो आसान है खुली आँखों से,
पर ख़्वाबों को हक़ीक़त करने का जुनून सबमें नहीं होता।

भीड़ में चलना तो हर किसी को आता है यहाँ,
पर अपने रास्ते पर चलने का हौसला सबमें नहीं होता।

मुश्किलों से लड़ने की बातें तो बहुत करते हैं लोग,
पर मुश्किलों में भी मुस्कुराने का हुनर सबमें नहीं होता।

ज़िंदगी में कामयाबी की ख्वाहिश रखते हैं सभी,
पर गिरकर फिर उठने का ज़ज़्बा सबमें नहीं होता।
— विकास त्रिपाठी “विक्की”
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dn Chaubey

7473 कविताएं

View Profile