टेलीफोन
पुराना लैंडलाइन टेलीफोन
एक संयुक्त परिवार था
एक घंटी बजती थी,
और पूरा घर दौड़ पड़ता था।
किसका फ़ोन होगा?
यही प्रश्न
हर चेहरे पर मुस्कान बनकर खिलता था।
डाँट, डपट, फटकार,
कुछ आँसू, कुछ प्यार—
क्या कुछ नहीं उतर आता था
उस एक फ़ोन पर!
तुम दूर अपने घर,
मैं अभागा परदेस में,
"कैसे हो?" की दो पंक्तियाँ ही
सात समंदरों की दूरियाँ
पल भर में पाट देती थीं।
जीवन-संगिनी,
तुम्हारी धीमी-सी आवाज़
तारों से उतरकर
सीधे हृदय में आ बसती थी।
माँ पूछती—
"खाना समय पर खाया न?"
पिता कहते—
"अपना ध्यान रखना।"
बच्चे झट से रिसीवर छीन लेते—
"पापा, जल्दी घर आना!"
दादी की दुआ,
दादाजी की सीख,
बहन की हँसी,
भाई की शरारत—
सबकी अपनी-अपनी जगह थी
उस एक टेलीफोन पर।
घर के एक कोने में रखा
वह साधारण-सा लैंडलाइन
दरअसल एक यंत्र नहीं,
रिश्तों का आँगन था।
आज हर जेब में मोबाइल है,
हर हाथ में दुनिया है,
पर न जाने क्यों
हर मन थोड़ा-सा अकेला है।
अब घंटियाँ नहीं,
नोटिफ़िकेशन बजते हैं;
आवाज़ें नहीं,
इमोजी मुस्कुराते हैं।
वीडियो कॉल में चेहरे तो दिखते हैं,
पर आँखों की नमी
कहाँ दिखाई देती है?
हज़ारों संपर्क हैं,
पर एक-दूसरे के लिए
समय नहीं।
सैकड़ों ग्रुप हैं,
पर वह एक घर
अब कहीं दिखाई नहीं देता।
मोबाइल ने
दुनिया को हथेली पर रख दिया,
लेकिन जाने कब
घर की चौखट से
संयुक्त परिवार को
धीरे-धीरे विदा कर दिया।
आज भी जब स्मृतियों की घंटी बजती है,
मन उसी कोने में लौट जाता है,
जहाँ एक पुराना लैंडलाइन रखा था—
और उसके इर्द-गिर्द
पूरा परिवार बैठा रहता था।
सच पूछिए तो—
पुराना लैंडलाइन टेलीफोन
सिर्फ़ एक फ़ोन नहीं था,
वह एक संयुक्त परिवार था।
— विजय नगरकर