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वो हसीं मोती अब पिरोये जा रहे हैं।

Vijay Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बेक़रारी में कुछ यूँ बहते जा रहे हैं।
        
                                                    
                            
क्यूँ हर ग़म को ये सहते जा रहे हैं।
कितनी राहत है इन बुझी हुई आँखों को,
चुपके से दर्द ये कहते जा रहे हैं।
बरसों की छुपी हुई हर इक दास्ताँ,
हर इक बूँद में खुलते जा रहे हैं।
ज़िंदगी क्या ख़ूब है तोहफ़े तुम्हारे,
नदी बन कर जो ये बहते जा रहे हैं।
तल्ख़ यादों का जो बोझ दे दिया तुमने,
वो हसीं मोती अब पिरोये जा रहे हैं।
2 महीने पहले
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