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यादों का घर

Vijay Erry

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            खोया हुआ था वो घर वक्त की भीड़ में,
        
                                                    
                            
यादों के धागों से बुना हुआ,
लेकिन सच तो यह था कि
वो घर नहीं, मेरी पूरी दुनिया था।
उसकी दीवारों पर उखड़ा हुआ रंग नहीं था,
वहाँ माँ की हथेलियों की गर्माहट छूटी थी,
वहाँ पिता की थकी हुई मुस्कानें थीं,
जो आज भी मेरी रूह को आवाज़ देती हैं।
दरवाज़ा आज भी वहीं खड़ा होगा शायद,
हर आहट पर चौकन्ना हो जाता होगा,
इस उम्मीद में कि कोई अपना लौटेगा,
मगर उसे क्या पता...
कुछ लोग घर नहीं छोड़ते,
बस ज़िंदगी उन्हें छीन लेती है।
आँगन की मिट्टी में दबी हुई होंगी
मेरे बचपन की नन्ही शरारतें,
जहाँ मैं गिरकर रोया भी था,
और माँ की गोद में हँसना भी सीखा था।
आज वही मिट्टी मेरी उँगलियों से फिसल गई है।
एक टूटा हुआ झूला अब भी होगा वहाँ,
जो हवा के साथ नहीं झूलता होगा,
बल्कि हर झोंके के साथ रोता होगा,
क्योंकि उसे याद होंगे वे दिन
जब उस पर बैठकर सपने आसमान छुआ करते थे।
रसोई अब सूनी होगी,
पर मुझे आज भी लगता है
कि कहीं कोई चूल्हा जल रहा है,
और माँ पुकार रही है मेरा नाम।
कुछ भ्रम इतने खूबसूरत होते हैं
कि इंसान उन्हें सच मानकर जीता है।
दीवारों पर टंगी तस्वीरें धुँधली हो गई होंगी,
मगर उनमें कैद लोग आज भी जवान होंगे।
यादों की उम्र नहीं बढ़ती,
वे हमेशा वहीं ठहरी रहती हैं
जहाँ हमने उन्हें आख़िरी बार देखा था।
जब रात बहुत गहरी होती है,
तो मुझे उस घर की खामोशी सुनाई देती है।
वह खामोशी चीखती नहीं,
बस धीरे से पूछती है,
"क्या सचमुच तुम आगे बढ़ गए हो,
या अब भी मेरे किसी कमरे में अटके हुए हो?"
छत की दरारों से गिरती हुई धूप,
और बरसात की पहली बूँदों की महक,
आज भी मेरे भीतर कहीं ज़िंदा है।
शायद इसलिए कि कुछ जगहें मिटती नहीं,
वे इंसान के भीतर बस जाती हैं।
लोग कहते हैं वह घर अब खंडहर है,
पर उन्हें क्या मालूम,
खंडहर ईंटों के नहीं होते,
खंडहर तो वे दिल होते हैं
जो अपने सबसे प्यारे दिनों को खो देते हैं।
आज अगर मैं वहाँ जाऊँ भी,
तो शायद कुछ पहचान न पाऊँ,
मगर यक़ीन है मुझे,
उस घर की दीवारें मुझे पहचान लेंगी।
वे मेरे आँसुओं की आवाज़ तक जानती हैं।
और कभी-कभी मुझे लगता है,
वह घर अब भी मेरा इंतज़ार कर रहा है...
ठीक वैसे ही जैसे माँ किया करती थी।
फर्क सिर्फ इतना है कि
माँ की तरह वह भी अब कुछ नहीं कहता,
बस चुप रहता है...
और उसकी यही चुप्पी
मेरे दिल को सबसे ज़्यादा रुलाती है।
~ विजय शर्मा एरी 
20 घंटे पहले
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