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वो गुण

Vijay Erry

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हरमन प्यारे दोस्त के वो गुण जो दर्पण में नहीं दिखतेकविता 
        
                                                    
                            
पर दोस्त की आत्मा की रोशनी छिपी रहती है,
उसकी हंसी में जो दर्द को भी पिघला दे,
वो गुण कभी शीशे में नहीं दिखते।उसकी आँखों में जो भरोसा है,
वो तस्वीरों से परे की दुनिया है,
जहाँ शब्द कम पड़ जाते हैं,
और मौन ही सबसे बड़ा सहारा बनता है।दोस्त की नीयत का उजाला,
कभी चेहरे की रेखाओं में नहीं मिलता,
वो तो दिल की गहराइयों में चमकता है,
जहाँ छल का कोई अक्स नहीं ठहरता।दर्पण में नहीं दिखती उसकी वफ़ादारी,
जो आँधियों में भी साथ खड़ी रहती है,
वो गुण तो समय की कसौटी पर चमकते हैं,
न कि काँच की सतह पर।उसकी दुआओं का असर,
कभी परछाईं में नहीं झलकता,
पर जीवन की कठिन राहों में,
वो अदृश्य शक्ति बनकर साथ चलता है।दोस्त की समझदारी,
जो बिना कहे सब कुछ जान लेती है,
वो गुण किसी प्रतिबिंब में नहीं,
बल्कि दिल की धड़कनों में दर्ज होता है।उसकी निस्वार्थता,
जो बिना मांग के सब कुछ दे देती है,
वो दर्पण की चमक से परे,
मानवता की असली पहचान है।उसकी मौन सहमति,
जो शब्दों से अधिक गहरी होती है,
वो गुण कभी आँखों में नहीं दिखते,
बल्कि आत्मा की गहराई में गूंजते हैं।दोस्त की हिम्मत,
जो टूटे हुए सपनों को जोड़ देती है,
वो दर्पण की दरारों में नहीं,
बल्कि जीवन की लड़ाइयों में चमकती है।और अंत में, उसका प्यार,
जो हर कमी को पूरा कर देता है,
वो गुण कभी परछाईं में नहीं,
बल्कि दिल की अमर रोशनी में बसता है।यह कविता दोस्ती के उन अदृश्य गुणों को उजागर करती है जो किसी दर्पण, वफ़ादारी, या निस्वार्थता से परे हैं।
एक महीने पहले
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