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जल ही जीवन है

Vijay Erry

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जल पर ऐसी कविता लिखते हैं जो केवल “जल बचाओ” का संदेश न दे, बल्कि पाठक को यह सोचने पर मजबूर करे कि जिस दिन पानी खरीदने को भी न मिले, उस दिन धन किस काम आएगा.
        
                                                    
                            
जल बचाओ — कल बचाओ
जल बचाओ — कल बचाओ
बूँद-बूँद में जीवन बसता,
बूँद-बूँद संसार.
फिर क्यों इस अनमोल धरोहर को,
करते हो बेकार?
नदियाँ थीं निर्मल कभी,
झरने गाते थे गीत.
ताल-तलैया भरते थे मन,
धरती रहती थी तृप्त.
आज वही नदियाँ रोती हैं,
कचरे में दम घुटता है.
जिस जल को अमृत कहते थे,
वही विष बनता दिखता है.
नल खुला है, पानी बहता है,
किसी को इसकी चिंता नहीं.
उधर किसी बस्ती में बच्चा,
तरस रहा है बूँदों के लिए कहीं.
कितनी अजीब कहानी है,
किसका कैसा भाग्य?
कहीं पानी सड़कों पर बहता,
कहीं एक घड़ा भी दुर्लभ.
नहाने में पानी उड़ाते हो,
दाँतों में नल खुला रखते हो.
वाहन धोते घंटों पानी,
फिर सूखे खेतों को देखते हो.
जरा नल बंद कर देखो,
बूँद की कीमत समझोगे.
आज अगर पानी बचाओगे,
कल जीवन को बचाओगे.
वर्षा की हर बूँद संभालो,
छत से धरती तक पहुँचाओ.
वर्षाजल का संचयन करके,
सूखते भूजल को बचाओ.
तालाबों को फिर से भर दो,
सूखी झीलें जीवित करो.
नालों को मत कचरा समझो,
जल के रास्ते स्वच्छ करो.
नदियों में कूड़ा मत डालो,
रसायन उनमें मत बहाओ.
औद्योगिक गंदा पानी भी,
शुद्ध करके फिर बाहर लाओ.
खेतों में पानी सोच-समझकर,
सिंचाई की नई विधि अपनाओ.
बूँद-बूँद से फसल उगाकर,
जल की बर्बादी रोक पाओ.
पेड़ लगाओ, वन बचाओ,
वर्षा का संतुलन लौटाओ.
पेड़ों की जड़ धरती के भीतर,
जल का भंडार बचाती है.
एक हरा वृक्ष केवल छाया नहीं,
वह जलधारा बन जाती है.
शहरों में पक्की जमीन बढ़ती,
धरती पानी कैसे पीए?
वर्षा आए, नाले भर जाएँ,
फिर भूजल कैसे जीए?
जहाँ संभव हो जमीन को,
कुछ खुला रहने दो.
वर्षा की बूँदों को धरती,
अपने भीतर कहने दो.
सरकार बनाए कितने कानून,
यदि हम खुद न बदलेंगे.
जल की कीमत समझ न पाए,
तो आने वाले कल में जलेंगे.
आज बोतल का पानी खरीद रहे,
कल शायद हवा भी खरीदें.
आज नदियों को गंदा करते,
कल तस्वीरों में उन्हें देखें.
याद रखो, धन के भंडार,
पानी नहीं बना सकते.
सोने-चाँदी के महल भी,
प्यास नहीं बुझा सकते.
जिस दिन कुएँ सूख जाएँगे,
जिस दिन नदियाँ थम जाएँगी,
जिस दिन खेतों की मिट्टी,
पानी को तरस जाएगी.
उस दिन कोई युद्ध नहीं होगा,
फिर भी संघर्ष महान होगा.
एक घूँट पानी के लिए,
मानव मानव के सामने होगा.
इसलिए आज ही प्रण कर लो,
जल की एक बूँद न व्यर्थ बहाएँगे.
नदी, तालाब, कुएँ बचाएँगे,
वर्षाजल घर में लाएँगे.
नल को जरूरत पर खोलेंगे,
जरूरत पूरी होते बंद करेंगे.
जहाँ रिसाव दिखाई देगा,
तुरंत उसकी मरम्मत करेंगे.
अपने बच्चों को आज सिखाओ,
जल केवल संसाधन नहीं.
यह जीवन की पहली शर्त है,
इसका कोई विकल्प नहीं.
जल है तो जंगल हैं,
जल है तो अन्न.
जल है तो जीवन है,
जल है तो जन.
आज बचाई छोटी-सी बूँद,
कल किसी की प्यास बुझाएगी.
आज बचाया एक तालाब,
कल पूरी बस्ती बचाएगी.
तो आओ मिलकर शपथ उठाएँ,
जल की मर्यादा को समझाएँ.
नदी बचाएँ, ताल बचाएँ,
धरती का श्रृंगार बचाएँ.
पानी को मत समझो सस्ता,
यह प्रकृति का अनमोल उपहार है.
जल बचाना केवल जिम्मेदारी नहीं,
आने वाली पीढ़ी से हमारा प्यार है.
जल बचाओ — कल बचाओ,
बूँद बचाओ — जीवन बचाओ.
— विजय शर्मा ऐरी
2 घंटे पहले
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