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कि सूरज भी ठिठककर रास्ता दे।

Vijai Pratap

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हिकमतों की लौ
        
                                                    
                            

मैं नहीं कहता
नया सूरज उगाएं हम
या हथेली पर उगा दें सरसों।

पर, इतना चाहता हूँ—
कि उठाएँ पाँव हम- जब भी,
तो एक ऐसी धमक हो,
कि बिगड़ जाए
दुनिया के कदमतालों की लय।

जलाएं हिकमतों की एक लौ ऐसी
कि भूले से अगर कोई
हमें आँखें दिखाए–
तो इतनी आग दहके
हमारी आँख में,
इन हौसलों में—
कि सूरज भी ठिठककर रास्ता दे।

और, जो नजरें उठी थीं
हमारे उपहास में, अवहेलना में—
वो झुकें भी,
और बिछ जाएं
हमारी राह में —
स्वीकार में,
या हार में।
5 दिन पहले
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