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ज़रूरी भी, एहतियात भी

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ज़रूरी भी, एहतियात भी
        
                                                    
                            

नए समय की नई कहानी,
तकनीक बनी अद्भुत वरदानी।
पल में दुनिया पास बुलाए,
मुश्किल राह सरल कर जाए।

कम्प्यूटर ने काम सँभाला,
इंटरनेट ने विश्व मिला डाला।
मोबाइल ने दूरी घटा दी,
हर हाथ में दुनिया ला दी।

जीपीएस ने राह दिखाई,
वीडियो ने दूरी मिटाई।
दूर बसे जो अपने प्यारे,
पल में दिखते आँखों के तारे।

एआई ने नव-द्वार हैं खोले,
ज्ञान-सृजन के अवसर खोले।
काम कठिन आसान बनाया,
सोच को नव-विस्तार दिलाया।

लेकिन सुविधा के संग-साथ,
ज़रूरी थोड़ी एहतियात।
सीमा में साधन वरदान,
सीमा भूले तो नुकसान।

मोबाइल से संसार जुड़ा है,
पर घर में संवाद घटा है।
दूर बसे अपनों को जोड़ें,
पास खड़े अपनों को न छोड़ें।

स्क्रीन ने दिन और रात बदल दी,
नींद और दिनचर्या बदल दी।
तन को थोड़ा विश्राम दिलाएँ,
समय पर सोएँ, समय जगाएँ।

हर चीज़ तुरन्त पाने की चाह,
धीरज को करती है तबाह।
क्षण भर रुकना भी अब भारी,
संयम रखना है समझदारी।

डिजिटल भीड़ बढ़ी है भारी,
फिर भी मन में तन्हाई जारी।
चेहरे हँसते दिखते बाहर,
दर्द छिपा रह जाता भीतर।

तुलना, चिंता और अकेलापन,
धीरे-धीरे तोड़ें मन।
तकनीक बने यदि जीवन-सार,
अवसाद खड़ा हो सकता द्वार।

सच और झूठ की रेखा धुँधली,
नकली भी अब दिखता असली।
एआई, वीडियो, चित्र बदलें,
सोच-समझकर सच को परखें।

हर दिन नई तकनीक आएगी,
नए समय की राह बनाएगी।
बदलावों से डरना कैसा?
सीखें, समझें—बढ़ना वैसा।

समय के संग चलना होगा,
नव तकनीक को सीखना होगा।
पर विवेक को साथ रखेंगे,
तभी सही हम राह चुनेंगे।

तकनीक रहे हाथों में अपने,
मन को उसके हाथ न सौंपें।
यंत्र हमारे साथी बन जाएँ,
हम यंत्रों के दास न कहलाएँ।

न डरकर इससे दूर ही भागें,
न इसके पीछे अंधे भागें।
नए समय से ताल मिलाएँ,
पर अपनी पहचान बचाएँ।

यही समय का मंत्र समझ लो,
यही भविष्य की बात भी—
तकनीक आज की ज़रूरत है,
ज़रूरी भी—एहतियात भी।
— संतोष कुमार शर्मा
1 सप्ताह पहले
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