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पर हम दोनों के अलग हैं पार प्रिये।

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            नदी तो आज भी बहती है,
        
                                                    
                            
पर बदला-बदला धार प्रिये।
मैं इस तट पर ठहरा हूँ,
तुम चली गई उस पार प्रिये।

एक नाव थी सपनों वाली,
जिसमें बैठे थे हम दोनों।
मंझधार में तू उतर गई,
भीगते रह गए हम दोनों।

किनारे पर तेरे पाँवों के,
अब भी मिलते निशान प्रिये।
मैं उनको देखकर जी लेता,
तुम बन गई अनजान प्रिये।

दूरी इतनी भी क्या थी हममें,
जो मिट न सकी एक पुकार प्रिये।
नदी तो आज भी बहती है,
पर हम दोनों के अलग हैं पार प्रिये।
एक महीने पहले
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