स्मृतियों के पिटारे में
तू बैठ मेरे रूबरू, तुझमें खोने का मन करता है,
आज तुझे याद करके खुश होने का मन करता है।
होती हैं दिल की भी कुछ मजबूरियाँ,
नहीं यूँ बेवजह किसी का रोने का मन करता है।
पर क्या करूँ, गिनती की चार यादें हैं मेरे पास,
जिनको सोचकर प्रसन्न होने की हो आस।
जाने कौन से पिटारे में वो बंद हो गई हैं,
मेरी कमजोर याददाश्त के चलते जाने कहाँ खो गई हैं।
सुना है तुम्हारे ही मुख से मैंने एक दिन,
स्मरण शक्ति नहीं है तुम्हारी, मेरी जितनी क्षीण।
बताओ ना, क्या तुम्हें याद है कोई ऐसा हसीन पल,
तुम मेरे पास हो और नहीं हो कहीं और मन।
मुझे तो बस याद आता है तुम्हें सोते हुए देखना,
तुम्हें छूने को हाथ बढ़ाना और फिर बेबसी से उसे रोकना।
तुम्हारी नींद गहरी होने पर तुम्हारा हाथ पकड़ना,
नींद न खुले तुम्हारी, बस भगवान से यही करना प्रार्थना।
बस एक ख्वाहिश मेरे मन की पूरी कर दो,
साल नहीं, महीने नहीं, जिंदगी के कुछ दिन ही दे दो।
मैं समेट लूँगी वो हर पल, भर लूँगी अपने दिल की सारी तिजोरियाँ,
और फिर उन्हें इतना सँभालकर खर्च करूँगी कि कम पड़ जाएंगी जिंदगी की डोरियाँ।
-पूजा शर्मा