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शायद हम ही

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कभी हम रूठे होते हैं,
        
                                                    
                            
या ज़िंदगी बेरुख़ी होती है—
कभी ज़िंदगी सवाल होती है,
या हम ख़ुद ही सवाल होते हैं।

कभी ज़िंदगी में चैन नहीं होता,
या हम ही बेचैन होते हैं—
कभी ज़िंदगी हमें तोड़ती है,
या हम ख़ुद ही बिखर जाते हैं।

कभी फ़िज़ा ख़ामोश होती है,
या हम ही ख़ामोश होते हैं—
कभी रास्ते नहीं मिलते,
या हम ही क़दम रोक लेते हैं।

हर बार ज़िंदगी को दोष देना आसान है,
मुश्किल तो ख़ुद को समझना है।

कभी हालात नहीं बदलते,
बस उन्हें देखने का नज़रिया बदल जाता है।

शायद हर सवाल का जवाब
बाहर नहीं, भीतर ही कहीं होता है—
मगर ख़ुद तक पहुँचने में
एक उम्र लग जाती है।

और आख़िर में
सवाल फिर वहीं ठहर जाता है—
ज़िंदगी हमसे रूठी है,
या हम अब तक
ख़ुद से ही रूठे हुए हैं?
— साक्षी यादव
2 महीने पहले
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