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राष्ट्रध्वज के पुष्प

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                            शपथ मातृभूमि की है,
        
                                                    
                            
कतरा-कतरा मिट जायेंगे।
लहू की एक-एक बूंद से,
हम गौरवदीप जलाएंगे।

चाहे जीवन हो या जवानी,
सब कुछ तुझ पर लुटाएंगे।
तेरे सपूतों की श्रृंखला में ,
एक और कड़ी जोड़ जायेंगे।

हम राणा सांगा हैं-
रणभूमि में लड़ते-लड़ते मर जायेंगे।
शीश कटे सो कट जाये ,
धड़ तलवार चलायेंगे।
अस्सी घाव तन पर खाकर ,
दुश्मन को थररायेंगे।

हम भगतसिंह हैं -
मृत्यु की डोली में ,
अमरत्व की दुल्हन लाएंगे।

हम सैनिक नहीं आग हैं ,
पर्वतों को पिघला देंगे।
दुश्मन के अरमानों की लंका,
धू-धू कर जला देंगे।

भूखे प्यासे लड़कर भी ,
हम युद्धवीर कहलाएंगे।
शपथ मातृभूमि की है ,
कतरा-कतरा मिट जाएंगे
लहू की एक एक बूंद से
हम गौरवदीप जलाएंगे।

किस वीरांगना के लाल हैं हम ,
यह दुनिया को दिखला देंगे।
माँ भारती के चरणों में गिर ,
हम लहू का कर्ज चुका देंगे।
मृत संजीवनी विद्या हम
इस दुनिया को सिखला देंगे।

शपथ मातृभूमि की है
कतरा-कतरा मिट जाएंगे।
लहू की एक-एक बूंद से ,
हम गौरवदीप जलाएंगे।

वसंत छायी है डाली-डाली ,
तो क्यों न जश्न मनायेंगे।
पतझड़ आने से पहले,
हम गीत शौर्य के गाएंगे।

पत्ते -पत्ते अपनी सुगंध
रणभूमि में फैलाएंगे।

क्या गिराएंगी हमको
वक्त की सर्द बयारे ।

क्या उनको इतना भी इल्म नहीं -
कि वीर कभी पतझड़ में नहीं गिरते।
वो तो बलिदानी हो राष्ट्रध्वज के
जीवंत पुष्प बन जाते हैं ।
और बलिदानो के बगीचों में,
युगो -युगो तक शीश उठाकर लहराते हैं।

शपथ मातृभूमि की है,
कतरा- कतरा मिट जाएंगे ।
लहू की एक -एक बूंद से ,
हम गौरवदीप जलाएंगे।
-राजलक्ष्मी राज
16 घंटे पहले
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