मानसून कुछ ऐसे आया जैसे रूठा प्रेमी मेरे घर आया है
न कुछ बोलता ना ही प्रेम नीर मुझपे ढोलता
पता नहीं किसने इसको भरमाया
मैं बनके पपिया रोज़ रोया करती थी बादलों की बाट जोया करती थी।
सूख चुका था तन मेरा अंग अंग जलने लगा , हरियाला मन मेरा जंगल बनने लगा
उसकी एक बूंद को ऐसे तरसती मैं जैसे चकवी तरसती मिलन को, मेरी पतियों पर कुछ ऐसे बरसों तुम जैसे अधरों पे शबनम आ गिरी
जब आओगे घर मेरे, पूरा शहर जान जाएगा मेरी महकती पवन मेरा चहकता मन, हरियाला बदन तुम्हारे आने का गीत गायेगा।
बताओ तुम तुम्हे बुलाने को कोनसे गीत गाऊं मैं क्या करूं मैं ऐसा जिससे रोज मिल पाऊं मैं।
तुम बरस कर चले जाते हो बड़े दिनों के बाद आते हो, ये विरह में सह पाती हूं क्योंकि पूरा सावन तुम्हारे पास रह पाती हूं।
जल्दी आओ भीगो दो तन मेरा , कर दो हरा भरा जीवन मेरा।