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बाग़ में आकर तुम्हें फूलों का लिहाज़ तक नहीं

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इक हथौड़ा लिए पर्वत को तोड़ने आए हो,
        
                                                    
                            
तुम्हें आख़िर ये आदेश किसने दिया है!
दौड़ती हुई आज तुम भी आई हो मेरे पास,
तुम्हें आख़िर ये संदेश किसने दिया है!
अपने देश की बर्बादी से जी नहीं भरा क्या,
तुम्हें आख़िर ये परदेस किसने दिया है!
अस्थियों वाले लोटे को भी कुचल रहे हो,
तुम्हें आख़िर ये अवशेष किसने दिया है!
गलियाँ चौड़ी करना, वो भी झोपड़ी हटाकर,
तुम्हें आख़िर ये निर्देश किसने दिया है!
पेड़ों की कटाई अनगिनत तुम जो कर रहे हो,
तुम्हें आख़िर ये परिवेश किसने दिया है!
किसी का दिल दुखाना कोई बुरी बात नहीं,
तुम्हें आख़िर ये उपदेश किसने दिया है!
बाग़ में आकर तुम्हें फूलों का लिहाज़ तक नहीं,
तुम्हें आख़िर यहाँ प्रवेश किसने दिया है!
- घनश्याम साहू
एक महीने पहले
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