कब बारिश होगी बादल से
कब अंबर से जल निकलेगा
छिपकर बैठा है लपटों में
वो सोना भी तो निखरेगा
चाहे अंबर में गरजन हो
राहों में कोई अर्चन हो
हम तब तक नईं फिर हारेंगे
जब तक इस दिल में धड़कन हो
पर्वत को ऐसे तोड़ेंगे
इक दिन तो रस्ता छोड़ेगा
धरती को इतना खोदेंगे
इक दिन उस
में जल निकलेगा
हर मुश्किल का हल निकलेगा
हर मुश्किल का हल निकलेगा