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काल चक्र

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                            कालचक्र
        
                                                    
                            

जाने वाले को जाना है,
कैसे यह रुक जाएगा?
अस्थिर है यह सारा जग,
रुककर जड़ कहलाएगा।

कालचक्र है गहन रहस्यमय,
इसकी महिमा अपरंपार।
आगंतुक का करो अभिनंदन,
पहना दो खुशियों का हार।

करूँ प्रार्थना ईश से ऐसी,
दे हम सबको यह वरदान—
प्रेम की धारा बहती जाए,
मिटे हृदय का हर विषाद।

कटुता के सारे कंटक मिटें,
मन में प्रेम खिले हर बार।
मानवता की ज्योति जले और
सुखमय हो संसार अपार।

जो आया है, उसका स्वागत हो,
जो जाता है, उसको प्यार।
यही जीवन की सच्ची रीति,
यही समय का सच्चा सार।
-भुवनेश्वर प्रसाद दीक्षित ‘भुवन’
एक महीने पहले
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