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बदल गई ज़माने की, जाने कैसी ये रीत है!

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            कच्ची सी डोर का, वो गहरा था बंधन,
        
                                                    
                            
धागा था कमज़ोर, पर सच्चा था स्पंदन।
वक्त गुज़रा तो धागा भी मोटा हुआ,
पर रिश्तों का एहसास कुछ छोटा हुआ।

अब रेशम के धागे हैं, सुंदर-मज़बूत,
पर जाने कहाँ खो गया, रिश्तों का वजूद।
धागे हुए पक्के, पर रिश्ते हुए हल्के,
भावनाओं के अश्क अब भीतर हैं छलके।

पहले हर हाल में, मिलने की आस थी,
भाई-बहन के दिलों में, वो मीठी सी प्यास थी।
अब भागदौड़ में, सब कुछ विपरीत है,
बदल गई ज़माने की, जाने कैसी ये रीत है!

राखी की वो खोती मिठास,
किससे लगाएँ हाथों पर उन धागों की आस।
सच कहें तो...
वो कच्चे धागे ही अच्छे थे,
जब ये रिश्ते सच्चे थे।

~शीतांशु शेखर
एक महीने पहले
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