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जहाँ अहं ने शीश झुकाया

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                            जहाँ अहं ने शीश झुकाया
        
                                                    
                            

रण की धूल अभी थी छाई,
साँझ विजय का संदेश लाई,
लंका का अभिमान था टूटा,
अंतिम बेला निकट थी आई।

राम ने लक्ष्मण को बुलाकर,
रावण का गुण उन्हें बताया,
“शत्रु सही, पर ज्ञानी है वह,
जाओ, उनसे सीखो”—समझाया।

लक्ष्मण पहुँचे शीश की ओर,
मन में विजयी भाव था छाया,
प्रश्न लिए उत्तर की आशा,
रावण ने पर मौन निभाया।

लक्ष्मण लौटे राम के सम्मुख,
“उसने कुछ भी नहीं बताया,”
राम ने कहा—“विनय से जाओ,
ज्ञान ने आदर सदा ही पाया।”

फिर लक्ष्मण चरणों में पहुँचे,
विनय सहित सम्मान जताया,
वही प्रश्न थे, वही था रावण,
इस बार उसने ज्ञान सुनाया।

मन से जब अभिमान मिटाया,
ज्ञान ने अपना द्वार दिखाया,
ज्ञान का दीप वहीं है जलता,
जहाँ अहं ने शीश झुकाया।

शत्रु रहा हो, फिर भी उसके,
गुण का करना मान सिखाया,
ज्ञान जहाँ से भी मिल जाए,
आदर से उसको अपनाया।

फल आते तो वृक्ष झुके हैं,
प्रकृति ने यह पाठ पढ़ाया,
जितना-जितना ज्ञान बढ़ा है,
उतना ही अभिमान घटाया।

गुरु केवल वह नहीं जगत में,
जिसके आगे शीश नवाया,
कभी विरोधी ने भी हमको,
जीवन का कुछ मर्म सिखाया।

छोटा हो या बड़ा कोई भी,
जिससे हमने ज्ञान है पाया,
ज्ञान का दीप वहीं है जलता,
जहाँ अहं ने शीश झुकाया।

सब कुछ जान लिया—यह कहना,
मन में केवल दंभ जगाए,
“अब भी मुझको सीखना है”—
यही भाव विद्वान बनाए।

राम ने शत्रु से भी लेकर,
ज्ञान का सम्मान बढ़ाया,
झुकने से कब कद घटता है,
विनय ने मानव मान बढ़ाया।

राम ने जग को यही सिखाया,
गुण जहाँ हो, आदर पाया,
ज्ञान का दीप वहीं है जलता,
जहाँ अहं ने शीश झुकाया।
— संतोष कुमार शर्मा
 
एक महीने पहले
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