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आओ, सब मिल हरेला मनाए

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            आओ, सब मिल हरेला मनाए
        
                                                    
                            

आओ, सब मिल हरेला मनाएँ,
नन्हे पौधों के संग खुशियाँ मनाएँ।

बरसात का सुहाना मौसम आया,
धरती ने हरियाली का श्रृंगार सजाया।

लेकिन अफ़सोस! यह कैसा मेला है,
हर चेहरे पर बस फोटो का रेला है।
कोई गमले को छूकर मुस्काता है,
कोई टहनी पकड़कर इतराता है।
कोई दो बूंद पानी देकर चल देता है,
फिर साल भर लौटकर नहीं आता है।
हरेला पर दिखावा बहुत हो जाता है,
पर पौधों का दर्द कौन समझ पाता है?

कल जब बारिश थम जाएगी,
हरियाली भी मुरझा जाएगी।
तब इन नन्हे पौधों को कौन बचाएगा?
कौन इन्हें अपना कहकर गले लगाएगा?
बिन देखभाल के ये अनाथ हो जाएँगे,
धीरे-धीरे सूखकर मिट्टी में समा जाएँगे।
फिर किसी दिन चिता की आग जलाने को,
इन्हीं पेड़ों की लकड़ियाँ काम आएँगी।

आओ, केवल तस्वीरें न खिंचवाएँ,
एक-एक पौधे को अपना बनाकर दिखाएँ।
जब तक वह वृक्ष न बन जाए,
तब तक उसका साथ निभाएँ।
तभी हरेला पर्व सफल कहलाएगा,
जब हर पौधा मुस्कुराकर लहलहाएगा।

आओ, सब मिल हरेला मनाएँ,
धरती माँ का ऋण कुछ तो चुकाएँ।




 
2 महीने पहले
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