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चौबीस रूपों में नारायण

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                            चौबीस रूपों में नारायण
        
                                                    
                            

विष्णु के चौबीस रूपों ने,
कितने अनदेखे राज बताए।
कहीं तपस्वी, कहीं वैद्य बन,
कहीं सिंह बन दुष्ट मिटाए।

हर रूप ने अपने ढंग से,
जीवन का सच्चा पाठ पढ़ाया।
हरि ने जब-जब नव रूप बनाया,
युग-युग का अँधियार मिटाया॥

सनकादि ने ज्ञान जगाया,
बालक तन में ध्यान दिखाया।
वराह बने, भू को उबारा,
धरती का सम्मान बचाया।

ज्ञान बचाए मन की धरती,
कर्म ने जीवन धन्य बनाया।
हरि ने जब-जब नव रूप बनाया,
युग-युग का अँधियार मिटाया॥

नारद ने वीणा झनकाई,
घर-घर हरि का नाम सुनाया।
नर-नारायण तप में बैठे,
मन को वश में करना सिखाया।

भक्ति संग संयम हो मन में,
भटका मन भी घर तक आया।
हरि ने जब-जब नव रूप बनाया,
युग-युग का अँधियार मिटाया॥

कपिल ने मन-तन का अंतर,
सरल ढंग से हमें बताया।
दत्तात्रेय ने जग से सीखा,
कण-कण में गुरु रूप दिखाया।

हर अनुभव में सीख छिपी है,
जिसने पढ़ा, वह आगे आया।
हरि ने जब-जब नव रूप बनाया,
युग-युग का अँधियार मिटाया॥

यज्ञ रूप ने त्याग सिखाया,
सबके हित का भाव जगाया।
ऋषभदेव ने राज त्यागकर,
संयम का सुख जग को बताया।

कम इच्छाओं वाला जीवन,
मन में सच्चा सुख भर लाया।
हरि ने जब-जब नव रूप बनाया,
युग-युग का अँधियार मिटाया॥

पृथु ने धरती खूब सँवारी,
अन्न भरा हर खेत बनाया।
मत्स्य बने, जब प्रलय उमड़ा,
बीजों को उस पार पहुँचाया।

अन्न, बीज और जल की रक्षा,
आज भी पहला धर्म बताया।
हरि ने जब-जब नव रूप बनाया,
युग-युग का अँधियार मिटाया॥

कूर्म बने, मंदर को थामा,
मंथन का आधार बनाया।
धन्वंतरि अमृत-घट लेकर,
रोगों का उपचार बताया।

मजबूत नींव, निरोगी काया,
जीवन को खुशहाल बनाया।
हरि ने जब-जब नव रूप बनाया,
युग-युग का अँधियार मिटाया॥

मोहिनी ने बुद्धि लगाकर,
अमृत देवों तक पहुँचाया।
नृसिंह जब स्तंभ से निकले,
भक्त प्रह्लाद को बचाया।

बुद्धि और साहस मिल जाएँ,
न्याय का फिर सूरज आया।
हरि ने जब-जब नव रूप बनाया,
युग-युग का अँधियार मिटाया॥

वामन ने बस तीन पग माँगे,
बलि ने अपना वचन निभाया।
हयग्रीव ने वेद सँभाले,
ज्ञान का उजियारा फैलाया।

रूप छोटा हो, ज्ञान बड़ा हो,
हर मुश्किल का हल मिल पाया।
हरि ने जब-जब नव रूप बनाया,
युग-युग का अँधियार मिटाया॥

श्रीहरि दौड़े गज की खातिर,
मगर से उसके प्राण बचाए।
परशुराम ने शस्त्र उठाकर,
अन्यायी के शीश झुकाए।

सच्ची पुकार कभी न डूबे,
हरि ने आकर साथ निभाया।
हरि ने जब-जब नव रूप बनाया,
युग-युग का अँधियार मिटाया॥

वेदव्यास ने वेद सँजोकर,
चार भाग में ज्ञान सजाया।
हंस रूप ने प्रश्न सुलझाकर,
आत्मज्ञान का दीप जलाया।

महाभारत आज भी हमको,
धर्म-कर्म का भेद बताया।
हरि ने जब-जब नव रूप बनाया,
युग-युग का अँधियार मिटाया॥

राम ने वन में धर्म निभाया,
मर्यादा का मान बढ़ाया।
कृष्ण बने सारथी, गीता से,
कर्मयोग का ज्ञान सुनाया।

एक ने करके राह दिखाई,
एक ने संशय दूर भगाया।
हरि ने जब-जब नव रूप बनाया,
युग-युग का अँधियार मिटाया॥

बुद्ध चले करुणा की राह पर,
जीव-दया का भाव जगाया।
कल्कि अभी समय के गर्भ में,
नए युगों का स्वप्न सजाया।

आज सँवरना सीख यही है,
भविष्य ने यह पाठ पढ़ाया।
हरि ने जब-जब नव रूप बनाया,
युग-युग का अँधियार मिटाया॥

हरि के रूप अनगिनत हैं,
हम सब गिन न पाएँगे।
चौबीस दीपों की ज्योति लिए,
हम आगे बढ़ते जाएँगे।

रूप अनेक, मगर हर रूप ने,
धर्म बचाने हाथ बढ़ाया।
हरि ने जब-जब नव रूप बनाया,
युग-युग का अँधियार मिटाया॥
— संतोष कुमार शर्मा
एक महीने पहले
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