विज्ञापन

परिंदे, तुम उड़ जाना”

User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तुम अगर ख़्वाब हो तो ख़्वाब में रह सकते हो,
        
                                                    
                            
मेरी आँखों में कोई रात-सा ढल सकते हो।
हमने माना कि तुम्हें जाना है जाना ही सही,
मगर जाते हुए कुछ याद तो रख सकते हो।
मैंने हर मोड़ पे तेरा ही इंतज़ार किया,
तुम किसी मोड़ पे बनकर मेरी आहट सकते हो।
मेरे हिस्से में अगर दर्द ही आया है तो क्या,
तुम मेरे दर्द को इक नाम तो दे सकते हो।
हमने चाहा नहीं तुमको कभी बाँध के रखें,
तुम अगर चाहो तो आज़ाद भी रह सकते हो।
मैंने मिट्टी की तरह तुझको सँभाला था मगर,
तुम हवा हो तो मेरे हाथ से उड़ सकते हो।
जाने वालों की कमी शहर में रहती तो है,
तुम मगर दिल से कहाँ सच में निकल सकते हो।
थक गए हो तो मेरी छाँव में ठहर सकते हो,
दिल नहीं मान रहा तो आँख भर सकते हो।
मैंने रखी हैं तुम्हारे लिए कुछ बातें अभी,
तुम अगर चाहो तो ख़ामोश भी रह सकते हो।
जिस तरह शाम उतरती है किसी सूने घर में,
तुम मेरे बाद भी कुछ देर ठहर सकते हो।
रात आएगी तो तकिए पे तुम्हारी यादें,
मेरे सीने में कई शोर मचा सकती हैं।
बस मेरे हिस्से की थोड़ी-सी उदासी लेकर,
तुम किसी शाम मेरी याद में रो सकते हो।
और अगर फिर कभी मिलना न लिखा हो अपना,
तो मेरी याद को दिल से न मिटाना तुम—
मैं तो मिट्टी हूँ, बिखर जाऊँगा बारिश में कहीं,
तुम परिंदे हो... किसी और वतन जा सकते हो।
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3561 कविताएं

View Profile