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बहुत याद आती है वो चिलम वाली दादी

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            बहुत याद आती है वो चिलम वाली दादी,
        
                                                    
                            
गुड़-गुड़ करती वो हुक्के का पानी।
रखती दिल में स्नेह, पर होंठों पर गाली,
चौपाल के कोने में रखी वो खटिया पुरानी।
दादी का दुलार और दादा की कहानी,
बहुत याद आती है वो चिलम वाली दादी।
छड़ी हाथ में लेकर जब वो पीछे भागती थी,
गुस्सा भी झूठा था, बस प्यार से ही डांटती थी।
थककर फिर जब चौखट पर बैठ जाती थी,
पास बुलाकर सिर पर हाथ सहलाती थी।
गांठ खोलकर आंचल की, गुड़ की डली थमाती थी,
बहुत याद आती है वो चिलम वाली दादी।
सर्दी की रातों में जब अलसाया बचपन सोता था,
दादी का पुराना कंबल सबसे गर्म खिलौना होता था।
परी-राजकुमारों की गाथा रात भर सुनाती थी,
सुलाकर चुपके से माथा मेरा चूम जाती थी।
घर के हर एक काम पर उनकी ही हुक्मरानी थी,
गुस्से में भी ममता की एक अनोखी रवानी थी।
बचपन के वो दिन, वो आंगन, वो छांव पुरानी,
यादों के उस गांव में अब बस बहती एक कहानी।
हुक्के की वो सांसें अब तो यादों में सिमट गई,
गांव की मीठी बातें, वक्त के पन्नों में निपट गई।
हाँ, बहुत याद आती है वो चिलम वाली दादी...
-श्रीकृष्ण
2 सप्ताह पहले
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