विज्ञापन

यह कैसा आज़ादी का जश्न है

User

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            यह कैसा आज़ादी का जश्न है?
        
                                                    
                            
यहाँ आज भी हर विचार एक प्रश्न है।
बेड़ियाँ तो टूट गईं ग़ुलामी की,
पर सपने आज भी जैसे सजा-ए- उम्र कैद है।
युगों तक काँटों भरा चमन रहा जिस गुलशन का,
सवेरा नया तो हुआ पर आँगन आज भी छलनी है इस धरती का।
बोये थे नए भारत के बीज वीरों ने
कि अब फ़ूल खिलेंगे खुशहाली , के छंट गया कोहरा उस गुलामी का।
ना जाने आजादी की कैसी देहरी पर खड़े हैं हम,
देश है सोने की चिड़िया पर आम इंसान की आँखें हैं नम।
जो अखण्ड भारत का ख्वाब संजोया था आजादी के दीवानों ने,
नीव तक हिला कर रख दी समाज के पहरेदारों ने।
मौन है समाज न्याय भी मौन है
जो करा शहीदों ने अपने वतन के लिए वैसा आज करता कौन है ?
ना करें अपमान अब उन वीरों की शहादत का,
जिनकी नींव पर ही है वज़ूद आज इस भारत का। आजादी केवल एक दिवस का विषय नहीं,
यह गाथा है लंबे संघर्ष की
धर्म, स्वार्थ और विकारों से ना करें मैली मिट्टी इस धरती की।
सौंपा था विश्वास से हमें जिन्होंने इस देश को,
चलकर कर्तव्य पथ पर करें साकार उनके सपनों को
छोड़कर समाज की संकीर्ण सोच की कहानी,
आने वाली नस्लों को दें सुरक्षित भारत की निशानी।
मिला है हमें तोहफ़ा आजादी की सुनहरी सुबह का
अब समय है लेकर संकल्प स्वर्णिम भारत के निर्माण का,
और मनाएँ गर्व से त्यौहार जश्न-ए- आज़ादी का ।
-नीता टहलयानी
 
2 महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Manju Sharma

3561 कविताएं

View Profile