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अनकही चमेली

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            थकी-थकी सी सुस्त खड़ी,
        
                                                    
                            
उपवन की खिली चमेली।
पंखुड़ियों पर ओस नहीं है,
शायद आँखें थीं उसकी गीली।

रातों को चुपचाप सिसकती,
चाँद से कहती बात अकेली।
काँटों ने तन ज़ख्मी कर डाला,
फिर भी महकती रही चमेली।

मंद पवन जब छूकर गुज़री,
कुछ पल को मुस्काई चमेली।
सूरज की पहली किरणों में,
फिर से निखरी भोली चमेली।

हवा चली तो काँप उठी,
जैसे कोई बात पुरानी।
पंखुड़ियों पर दर्द लिखा था,
फिर भी महकी उसकी जवानी।

अब भी जब पुरवाई आती,
डाली धीरे-धीरे हिलती।
लगता जैसे बीते कल की
कोई याद अचानक मिलती।

थकी-थकी सी सुस्त खड़ी,
उपवन की खिली चमेली।
खुद मुरझाकर भी दुनिया को
महकाती रही अकेली।।।
:-- राकेश कुमार तिवारी
2 सप्ताह पहले
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