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मेरी शख्सियत का पैमाना भी,

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Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            शख्सियत के पैमाने भी ,
        
                                                    
                            
क्या खूब रचे हुए है जहां ने।
मैं मुस्कुरा लूं,तो अलग
आंखे छुपा लूं,तो अलग...।

गर बेतरतीब हो जाऊं,
तुझे संवारने में, तो अलग..
और खुद संवर जाऊं,तो अलग..।

जवाब दूं अगर,
मैं तेरे हर सवाल का,तो अलग..
और खामोशी ओढ़ लूं,
भरे कोलाहल में भी,तो अलग।

बस किसी एक का ,
ये अलग होना ही,समझ नहीं आता।
मुझ में किसी को कुछ,
तो किसी को कुछ नहीं भाता।

मेरी शख्सियत का पैमाना भी,
तुमने कुछ रचा अलग है।
शायद मैं अलग हूं,
तो मेरा पैमाना भी अलग है।
- राजेश कनवाड़िया
20 घंटे पहले
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