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उनकी फ़ज़ल रही

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जब से होश सम्भाला मैंने उनकी फजल रही।
        
                                                    
                            
क्या औलाद से बढ़कर पाला यही गल रही।।

क्या कुछ नही किया अब जाकर समझ पाई।
औरों को देखती उनसे हर तरह आगे मैं रही।।

मलाल फिर भी बना रहा जो जाता ही नही।
कानो ने जो सुना उससे भ्रमित अब तक रही।।

तरह-तरह के विचार अलग-थलग करते रहे।
उनके लिए मैं कुछ कर सकी बस रूठी रही।।

हकीकत जिंदा रहेगी मिटा नही पाएगा कोई।
दूसरो को मदद करने की इच्छा ही नही रही।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
4 दिन पहले
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