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सुकून भरी जिंदगी

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            समझ आता तो रिश्ता बनाते ही क्यों।
        
                                                    
                            
सरल जिंदगी को और उलझाते ही क्यों।।

खुशी से हामी भर दी ख्वाबों में डूबकर।
गाँव को छोड़ उनके शहर आते ही क्यों।।

उम्मीदों के मेले में एहसास के बुलबुले।
यों मिल जाते तो तकलीफ़ उठाते ही क्यों।।

हकीकत से वाकिफ होते ही ओले गिरे।
मालूम होता तो रिश्ते आजमाते ही क्यों।।

सुन रखा था बहुत कुछ 'उपदेश' काम के।
सुकून भरी जिन्दगी में दर्द आते ही क्यों।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
एक महीने पहले
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