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शाम ढली

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            शाम ढली तो छिपने को ढूँढे तेरी बाहें।
        
                                                    
                            
साँस चढ़े उतरें बाकी बेचैनी की चाहें।।

दिल का सौदा करके पाया खालीपन।
होंठों पर मुस्कान सजाई सीने में आहें।।

किस्मत तुझको मांगे इतना दीवानापन।
नौकरी में तुम से दूर इश्क कैसे निबाहें।।

साथ में जब थे तब सोया था अपनापन।
अब बेताबी में ज्वारभाटा सी उठे आहें।।

बिस्तर सूना राग सुनाये खाली दामन।
नींद न आए 'उपदेश' उठे जज्बाती आहें।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
3 महीने पहले
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