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रोज रोज कौन ढूँढे

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अब तुम्हें रोज रोज कौन ढूँढे।
        
                                                    
                            
मन साथ रखने की वज़ह ढूँढे।।

जिन्दगी अँधेरे में गुजारी मैंने।
रात अपने तरीके से सुबह ढूँढे।।

मोहब्बत करने को दिल बेताब।
इस तरह का इंसान तेरी राह ढूँढे।।

जिन्दगी जन्नत बनाना चाहे जो।
तुम्हारे पहलू में अपनी पनाह ढूँढे।।

अब तो आप जान गए 'उपदेश'।
जिसको मिली ही नही वह ढूँढे।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
2 महीने पहले
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