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शून्य में शून्य हो जाने की सोच में पिघल रही।

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जिन्दगी देख लो अपनी तरह से चल रही।
        
                                                    
                            
सुबह शाम में और शाम रात में बदल रही।।

बस मैं ठहरी हुई हूँ किसी के इंतजार में।
मेरा मन नासमझ उसके अन्दर हलचल रही।।

बार बार खुद को ही दर्पण में देख देखकर।
शून्य में शून्य हो जाने की सोच में पिघल रही।।

कब कैसे वह जुड़ गया जीवन के विस्तार में।
समझ नही पा रही समझ ही मेरी पिछल रही।।

मन कभी कोमल बन जाता और कभी कठोर।
असमंजस में डूबी 'उपदेश' धीरे-धीरे ढल रही।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
एक महीने पहले
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