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मकबरे की दीवारें

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जिसको घर समझ कर सजदे किये।
        
                                                    
                            
वो मकबरे की दीवारें मेरा खून पिये।।

मुसाफिर आकर ठहरा करते थे जहाँ।
उनमें रहकर ठहरने वाले ही न जिये।।

लोग कहते हैं वक्त गुजर जाया करते।
साथ के लम्हे गम भर-भर के न जिये।।

नशा कैसा भी रहा उतर जाया करता।
सफर पूरा न हुआ आराम से न जिये।।

हर एक समझौते पर दखल 'उपदेश'।
दिन की नज़रों से उतरें उजाले न जिये।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
2 महीने पहले
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