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लूट गया

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            जिसने तोड़ा जिंदा दुआओ की आन को।
        
                                                    
                            
वही उजाड़ गया फलते फूलते मकान को।।

जिसको माना था खुदा की तरह समाज ने।
वही निगल गया बसे बसाये आसमान को।।

किस तरह विकास सिर पर चढ़कर बोला।
लूटा गया बेझिझक उसी की पहचान को।।

जिसके नाम से महकती थी रूह मेरी यहाँ।
खुले में जिस्म को सौप दिया श्मशान को।।

किरणो को डर लगा मेरी छत पर आने से।
बादलों ने घेरा 'उपदेश' उजाड़े मकान को।।

माहौल बनाया जा रहा बहुत कुछ सोचकर।
प्रयास जारी चल रहा अनकहे सम्मान को।।

- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
गाजियाबाद
2 महीने पहले
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