विज्ञापन

जो चाहा सब को उससे बढ़कर मिलता।

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अपने-अपने ख्यालो की दुनिया बना रहे।
        
                                                    
                            
कहते रहते कि हम रिश्तों को निभा रहे।।

उनका क्या जिन्होंने अपना कन्धा दिया।
उनके कंधो पर पाँव रख खुद इतरा रहे।।

मंजिल के आस-पास तक पहुँचे कहकर।
कईयों के दिल छलनी करके मुस्कुरा रहे।।

हकीकत समझने की फुर्सत मिली नही।
क्या इकट्ठा कर रहे और क्या छितरा रहे।।

जो चाहा सब को उससे बढ़कर मिलता।
मगर 'उपदेश' हर समझौते को ठुकरा रहे।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
4 दिन पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Updesh Kumar

12618 कविताएं

View Profile

Nathuram Kaswan

8654 कविताएं

View Profile

User

30 कविताएं

View Profile