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मेरी काया का कण कण उपयोगी लगता तुमको।

Updesh Kumar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मेरी काया का कण कण उपयोगी लगता तुमको।
        
                                                    
                            
उस भ्रम के वशीभूत ही अधिक तपाया मुझको।।

हाथ थामकर अँधियारी गालियों में राह दिखाना।
पर घातक पाया अपनो को खूब सताया मुझको।।

छिद्रयुक्त छाता मेरा मन तन कर खड़ा रहा पीछे।
जब तुम्हें संताप सताया औषधि बनाया मुझको।।

मिली ठोकरे रही संभलते टूट न सकी बिलकुल।
हर तरह की तकरीरो में हिम्मत दिलाया मुझको।।

अपने हिस्से की खुशियाँ अडकर लड़कर जीती।
थककर छोड़ गए 'उपदेश' अज्ञानी पाया मुझको।।
- उपदेश कुमार शाक्यावार 'उपदेश'
 
एक महीने पहले
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