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तेरी चौखट पे ही प्राण-दीपक बुझे

Trishika Srivastava

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तेरा बहरूपिया बन के मुझको छले
        
                                                    
                            
बद्र की रात का चाँद तुझ-सा लगे

तेरे पट-छोर से मेरा आँचल-सिरा
ऐसे बाँधूँ कि सौ-सौ जनम ना खुले

टीस उठती है मेरे भी दिल में पिया
तेरे पग में अगर कोई काँटा चुभे

कोई दूजा ना मुझको चुरा ले कहीं
सात फेरों के बन्धन में रख लो मुझे

अब कहीं और जाने की चाहत नहीं
तेरी चौखट पे ही प्राण-दीपक बुझे
— त्रिशिका धरा
5 दिन पहले
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