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बाबरा-दर्द की ख़ामोशी

sushilkumar babra

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तेरे जाने का हमें आज भी सदमा है बहुत,
        
                                                    
                            
दिल ने चुपचाप मगर तेरा ग़म सहा है बहुत।

हमने हर ज़ख़्म को सीने में छुपा रखा है,
लोग कहते हैं कि ये शख़्स तो हँसता है बहुत।

जिसको अपना कहा, उसने ही पराया कर दिया,
क्या इससे बढ़कर भी कोई दर्द मिला है बहुत।

तेरी तस्वीर को सीने से लगाए बैठे,
दिल-ए-नादाँ ने तुझे अब भी पुकारा है बहुत।

रात तनहाई में जब चाँद उतर आता है,
तेरी यादों का धुआँ दिल में उठा है बहुत।

तेरी महफ़िल में हमारा भी कभी ज़िक्र हुआ,
फिर भी होंठों ने तेरा नाम न लिया है बहुत।

तूने पूछा ही नहीं हाल कभी दिल का मेरे,
और इस बात का अफ़सोस हमें रहा है बहुत।

कुछ ख़त ऐसे हैं जिन्हें आज तलक खोल न पाए,
हर एक लफ़्ज़ में इक दर्द छुपा है बहुत।

अब न शिकवा है तुझसे, न कोई इल्ज़ाम तुझे,
इश्क़ ख़ामोश सही, दिल में मगर ज़िंदा है बहुत।

‘बाबरा’ किससे कहें हाल-ए-दिल-ए-ज़ार अपना,
जिसे समझना था वही शख़्स ख़फ़ा है बहुत।

शायर: सुशील कुमार ‘बाबरा’
2 महीने पहले
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