सावन:अध्यात्म और प्रणय
हमारी संस्कृति में सावन
का अपना ही महात्मय है।
अध्यात्म और प्रणय का
का इसी में तदात्मय है।
सावन में गर अध्यात्म
एक विनिबंध है
तो प्रणय एक निबंध है।
गर देखना हो
प्रणय को साकार
तो अध्यात्म को करो
नमस्कार।
सावन में प्रणय
गर आत्मा से आत्मा को
संबोधन है।
तो अध्यात्म एक उद्बोधन है।
यूं भी हमारी सनातन
संस्कृति में,
प्रकृति को सावन करता सदा
वंदन है।
सावन मास में
प्रणय और अध्यात्म का
एक अभिनव सा अभिनंदन है।
यूं भी सावन का महीना
प्रणय और अध्यात्म का
स्पंदन है।
मानव की भावनाओं का
अनन्य सा बंधन है।
अब ये मानव पर है,
उसे क्या पसंद है?
उसे प्रणय का बंधन
या फिर ईश्वर का वंदन।
-सूर्यकांत शर्मा