दोस्ती
दोस्तों के हज़ूम में
मुख्तलिफ सा रंग देखा,
जफ़ा के मुलम्मे में,
वफ़ा को तंग देखा।
दोस्तों के दिल में
उनकी बज़्म में,
पैसे और रसूख
का नया सा ढंग देखा।
कभी हुआ करती
होंगी,
यारी दोस्ती और मस्ती!
अब तो दोस्ती का
संग भी बदरंग देखा।
सारी की सारी
कायनात ही सिमटी
सी लगती है
जब से हर इंसा को
खुदगर्ज़ी की मर्ज़ी
से बेढंग देखा।
भेजा है हमने भी
पैगाम ए मुहब्बत,
ग़ज़ल की बहर में
नज़्म की सहर में
पर अब तो उसे भी
मजहबी ढंग में
लौटते बैरंग देखा।
-सूर्यकांत शर्मा